ग्रीष्म ऋतु में पालन योग्य आहार-विहार
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ग्रीष्म ऋतु में पालन योग्य आहार-विहार

हमारे शरीर और स्वास्थ्य पर आहार-विहार के अलावा ऋतु और जलवायु का भी प्रभाव पड़ता है इसलिए स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ऋतु और जलवायु के अनुकूल आहारविहार करना ज़रूरी है । इस स्थायी स्तम्भ के अन्तर्गत ऋतु के अनुकूल करने योग्य आहार-विहार से सम्बन्धित विवरण प्रस्तुत किया जाता है ।

हमने वर्ष 2004 में ग्रीष्म ऋतु (अप्रेल 04) अंक के इस स्तम्भ के अन्तर्गत “ग्रीष्म ऋतु में पालन योग्य आहार-विहार’ के विषय में स्वास्थ्य रक्षा के लिए उपयोगी तथा आवश्यक विवरण प्रस्तुत किया था। अब एक वर्ष बाद पुनः यह अवसर आया है कि हम ग्रीष्म ऋतु में पथ्य यानी पालन योग्य आहार-विहार और अपथ्य यानी पालन न करने वाले आहार-विहार के बारे में विचार-विमर्श करें और ऋतु के अनुकूल आहारविहार का पालन कर अपने स्वास्थ्य की रक्षा और बीमारियों के प्रभाव से बचे रहने का संकल्प करें। तो लिजिए, विचार विमर्श शुरू करते हैं।

यूं तो हमारे देश में वर्ष का अधिकांश समय गर्म वाला ही होता है लेकिन ग्रीष्म ऋतु तो होती ही गर्म वाली है इसीलिए इसे ग्रीष्म ऋतु कहा जाता है। इस ऋतु में गर्म क्यों पड़ती है इसका उत्तर देते हुए आयुर्वेद में कहा गया है-

ग्रीष्मे तीक्ष्णांशुरादित्यो मारुतो नैऋृतो सुखः। भूस्तप्त सरितस्तन्व्यो दिशः प्रज्वलिता इव ।। : – सुश्रुत संहिता सूत्र

अर्थात् ग्रीष्म ऋतु में सूर्य (पृथ्वी के पास आ जाने के कारण) तीखी किरणों वाला हो जाता है, नैऋत दिशा की कष्टदायक हवा बहती है जिससे पृथ्वी तपने लगती है, नदियां सूख जाती हैं या पतली धार वाली हो जाती हैं और सब दिशाएं गर्म से जलती हुई मालूम देती हैं।

ग्रीष्म ऋतु, आदानकाल की अन्तिम ऋतु होती है। वर्ष में दो काल होते हैं आदानकाल और विसर्गकाल। दोनों कालों में 3-3 ऋतुएं होती हैं- आदानकाल में शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म ऋतु तथा विसर्गकाल में है वर्षा, शरद और हेमन्त ऋतु। आदानकाल में पृथ्वी सूर्य के निकट होती है अतः यह काल रूखा, सूखा और गर्म रहता है। “आदान दुर्बले देहे पक्ता भवति दुर्बले:’ (चरक संहिता) के अनुसार आदानकाल के प्रभाव से जीवों का शरीर अत्यन्त दुर्बल हो जाता है क्योंकि “मयूखैर्जगतः स्नेहं ग्रीष्मे पेपीयते रविः’ के अनुसार ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी प्रखर किरणों से संसार का स्नेह सोख लेता है जिससे सिर्फ मनुष्यों का शरीर ही नहीं बल्कि पेड़ पौधों, वनस्पति, नदी तालाब, कुओं का जलीयांश भी सूख जाता है। यह ग्रीष्म ऋतु का गुण-धर्म है और हमें इस गुणधर्म कलों ध्यान में रख कर ऋतु के अनुकूल तथा हितकारी आहार-विहार का ही पालन करना चाहिए ताकि हम मौसमी बीमारियों के जाल में फसने से बच सकें। इतना संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करने के बाद अब ग्रीष्म ऋतु में पालन करने योग्य पथ्य-अपथ्य आहारविहार की जानकारी प्रस्तुत करते हैं।

पथ्य आहार-विहार

पथ्य आहार-

इस ऋतु में किये जाने वाले आहार में ऐसे ही पदार्था एवं व्यंजनों का सेवन करने का ध्यान रखना चाहिए जो शरीर में स्निग्धता, तरावट और शीतलता लाने वाले हों। “स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धमन्न पानं तदाहितम्’ (चरक संहिता) के अनुसार  ग्रीष्म ऋतु में मधुर रस युक्त तथा शीतवीर्य (ठण्डी तासीर वाले) गुण वाले, तरल तथा स्निग्ध (चिकनाई युक्त) द्रव्यों का सेवन करना चाहिए ताकि शरीर में शीतलता व तरावट बनी रहे जिसकी ग्रीष्म काल में शरीर को सख्त ज़रूरत होती है।

इसके लिए दूध चावल की खीर, दूध, घी, मीठे चावल, सत्तू  का घोल, नींबू की शिकंजी, दूध-पानी की मीठी लस्सी, आंवलें का मुरब्बा, गुलकन्द आदि का सेवन करना हितकारी होता है। “भजेन्मधुरमेवान्नं लघुस्निग्धं हिमं द्रवम्’ (वाग्भट) के अनुसार ग्रीष्म ऋतु में मीठे, हलके, स्निग्ध, शीतल और सुपाच्य पदार्था का ही सेवन करना चाहिए। ऐसे पदार्थों में ताज़ी चपाती (रोटी) के साथ चने की  भाजी, बथुआ, चौराई, परवल, पके लाल टमाटर, छिलका रहित आलू, हरी मटर, करेला, कच्चे केले, तरबूज के छिलके, हरी ककड़ी की शाक-सब्ज़ी और दालों में सिर्फ मसूर की दाल या छिलके वाली मूंग की दाल का ही सेवन करना चाहिए। अरहर या चने की दाल खाएं तो चावल के साथ खाएं या 1-2 चम्मच शुद्ध घी में जीरा डाल कर इसका तड़का लगा कर खाएं ताकि इन दालों की खुश्की खत्म हो जाए। फलों में मौसमी फलों का सेवन करें। दही का सेवन करें तो घर का जमा हुआ, ताज़ा और बिना कटा हुआ दही थोड़ा पानी डाल कर और अपनी रुचि के अनुसार शक्कर या नमक पिसा जीरा डाल कर खाएं । अन्य पदार्था में सिंघाड़ा, प्याज, नींबू, हरा धनिया, पोदीना, कच्चे आम को भून कर बनाया हुआ मीठा पना, नींबू की मीठी शिकंजी, ठण्डाई, पतला सत्तू, गुलकन्द, आगरे का पेठा, आंवले का मुरब्बा, दूध पानी की मीठी लस्सी आदि सेवन करने
योग्य पथ्य पदार्थ हैं।

पथ्य विहार-

ग्रीष्म ऋतु में पालन योग्य विहार यानी रहन सहन (दिनचर्या) की शुरूआत सुबह उठने से ही हो जाती है। सुबह सूर्योदय होने से पहले तीन काम निपटा लेना चाहिए। ठण्डा पानी चार गिलास या जितना अधिक से अधिक मात्रा में पी कर शौच क्रिया करना, दूसरा स्नान करना और तीसरा वायु सेवन के bिए 3-4 किbो मीटर तक घूम कर bौट आना। इसके बाद सूर्योदय हो या हो रहा हो। bौट कर योगासन या व्यायाम करें तो क्या कहने ! इसके बाद आठ बजने से पहbे चाहें तो नाश्ता कर bें। ग्रीष्म ऋतु में भी अन्य ऋतुओं की तरह निश्चित समय पर ही भोजन करना चाहिए यानी भूख सहन नहीं करना चाहिए। भूख से थोड़ी कम मात्रा में खाना चाहिए और प्रत्येक कौर 32 बार चबाना चाहिए। तैb से शरीर की माbिश करके स्नान करना और रात को सोते समय मb विसर्जन के bिए शौचाbय जाना हितकारी होता है।

 अपथ्य आहार-विहार


अपथ्य आहार-

ग्रीष्म ऋतु में कड़वे, कसैbे, चरपरे, खट्टे, तेज़ ंिमर्च मसाbेवाbे, तbे हुए, बेसन के बने, bाb मिर्च व गरम मसाbायुक्त, बासे और दुर्गन्धयुक्त पदार्था का सेवन नहीं करना चाहिए। खट्टा, कटा हुआ और बासा दही नहीं खाना चाहिए, बिना पानी और शक्कर या नमक जीरा मिbाए दही नहीं खाना चाहिए और “न नºं दधि भुÄजीत’ के अनुसार रात में दही नहीं खाना चाहिए।फ्रिज में रखा पानी नहीं पानी चाहिए। पीना ही चाहें तो पानी फ्रिज से बाहर निकाb कर थोड़ी देर रखा रहने दें ताकि पानी की असामान्य शीतbता सामान्य हो जाए फिर पिएं। इससे गbे में खराश, मन्दा¾ि, अपच, सर्दी जुकाम, टांसिbाइटिस आदि व्याधियां नहीं होतीं। बहुत ज्यादा गर्म या बहुत ज्यादा ठण्डा खान-पान न करें। उडद व चने की दाb, अरहर (तुअर) की दाb, bहसुन, इमbी व अमचूर की खटाई, शहद, सिरका आदि का सेवन न करें।

अपथ्य विहार-

इस ऋतु में कुछ लोग सुबह देर तक सोये रहना पसन्द करते हैं जो शरीर, स्वास्थ्य और चेहरे की सुन्दरता, खास करके आंखों के bिए हानिकारक होता है इसbिए सुबह देर तक सोये रहना और देर रात तक जागना ठीक नहीं। सहवास में  अति न करें बल्कि आयुर्वेद ने तो मना ही किया है यथा- “ग्रीष्मकाbे निषेवेत मैथुनाद्विरतो नरः’अर्थात् ग्रीष्म काb में मैथुन (óी सहवास) करना ही नहीं चाहिए। अब
यह उपदेश उस ज़माने में दिया गया था जब न तो बोल्ड सीन वाbी फिल्में थीं, न अद्र्धन¾ भड़कीbे कामोत्तेजक दृश्यों वाbे विज्ञापन दिखाये जाते थे, न चोरी छिपे अश्bीb फिल्में देखने की जुगाड़ होती थी तो पुरुष को संयम रखने में कठिनाई नहीं होती थी पर आज के ज़माने में जब कामोत्तेजक स्थितियां विभिन्न कारणों और रूपों से कदम-कदम पर सामने उपस्थित हो रही हों तब ऐसे उपदेश पर अमb
करना हर किसी के बस की बात नहीं है इसbिए हमने कहा कि ग्रीष्म ऋतु में कम से कम सहवास करें। तेज़ धूप में घूमना, भूखे प्यासे घूमना, bगातार भारी श्रम करना, अति व्यायाम करना, दिन में सोना, मb-मूत्र और प्यास के वेग को रोकना आदि नहीं करना चाहिए।

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Post source : निरोगधाम पत्रिका अप्रैल 2005 (लेखक:- अशोक कुमार पाण्डेय बी. काम., आयुर्वेद रत्न)

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