उदर रोग, यकृत की खराबी व कमज़ोरी में उपयोगी पंचकोल

उदर रोग, यकृत की खराबी व कमज़ोरी में उपयोगी पंचकोल

आहार-विहार में अनियमितता, स्वादवश अपथ्य पदार्था का सेवन तथा पथ्य पदार्था का अति सेवन- इन तीनों कारणों से आज कल उदर रोग, यकृत की खराबी व कमज़ोरी और इन अंगों से सम्बन्धित व्याधियां व्यापक रूप से फैbी हुई पाई जा रही हैं। इन व्याधियों को नï करने वाbे एक आयुर्वेदिक योग पंचकोb का परिचय प्रस्तुत है ।

पांच द्रव्यों के योग को पंचकोल कहते हैं। इस योग में पांच द्रव्यों को समान मात्रा में लेकर कपड़छन महीन चूर्ण कर के मिलाया जाता है। इस नुस्खे के पांच द्रव्य 1-1 कोल (आठ-आठ माशा) मिला कर यह योग बनाया जाता था इसलिए इसका नाम “पंचकोल’ हुआ।

भावप्रकाश निघुण्ट में लिखा है-

पिप्पली पिप्पलीमूलं चव्यचित्रकनागरैः।
पंचभिः कोलमात्रं यत्पंचकोल तदुच्यते।।
पंचकोलं रसे पाके कटुकं रुचिकृन्मतम्।
तीक्ष्णोष्णं पाचनं श्रेठ दीपनं कफवातनुत्।।
गुल्म प्होलीदरानाह शूलनं पित्तकोपनम्।

परिचय-

पीपल, पीपलामूल, चव्य, चित्रक (चीता) और सोंठ- इन पांच द्रव्यों के योग को पंचकोल कहते हैं। इन पांचों द्रव्यों को पंसारी के यहां से 50-50 ग्राम मात्रा में ले आएं। अलग-अलग खूब कूट पीस कर महीन चूर्ण कर लें और बराबर-बराबर वज़न में लेकर मिलालें। इसे शीशी में भर कर रख लें। बस, “पंचकोल’ तैयार है।

सेवन विधि-

इसके सेवन की दो विधियां है। इसकी आधा चम्मच मात्रा (लगभग 3 ग्राम) एक गिलास छाछ में घोल कर भोजन के साथ घूंट-घूंट करके
पीना चाहिए या शहद में मिला कर चाट लेना चाहिए। व्याधि दूर होने तक सेवन करके बन्द कर दें। इसे दाल शाक में बुरक कर भी सेवन कर सकते हैं या एक चम्मच चूर्ण कुनकुने गरम पानी के साथ सुबह शाम भोजन के बाद ले सकते हैं।

दूसरी विधि-

छिलके वाली मूंग की दाल के साथ सेवन करने की है। एक साफ सफेद कपड़े में लगभग 20 ग्राम चूर्ण रख कर छोटी सी पोटली बना कर धागे से बांध दें। दाल के लिए पानी आग पर रखते समय ही यह पोटली पानी में डाल दें। अब जिस तरह से दाल बनाई जाती है वैसे ही दाल
पकाएं। जब दाल पक जाए तब पोटली निकाल कर फेंक दें। 25 ग्राम शुद्ध घी व 10-12 दाने जीरे का छौंक तैयार करें और इस दाल को बघार दें। इस दाल को परिवार के सभी लोग खा सकते हैं यानी व्याधिग्रस्त ही नहीं स्वस्थ व्यक्ति भी इसे खा सकता है। रोग ग्रस्त 5-6 दिन तक प्रतिदिन इसका सेवन करें फिर सप्ताह में 2-3 बार करता रहे। इसे पंचकोल साधित मूंग की दाल कहते हैं। इस योग की प्रकृति उष्ण होती है अतः अनुकूल मात्रा में, शुद्ध घी का बघार लगा कर , उतनी ही अवधि तक सेवन करना चाहिए जब तक उदर रोग, भूख की कमी, पेट का फूलना, अपच, गैस की शिकायत आदि शिकायतें दूर न हो जाएं। सप्ताह में 1-2 बार सेवन करने में कोई हानि नहीं।

लाभ-

पंचकोल चूर्ण उत्तम रुचिकारक, भूख बढ़ाने वाला और पाचन क्रिया सुधारने वाला गुणकारी योग है। इसके सेवन से पेट का अफारा, पलिहाव्रिधि, गुल्म, शूल, कफजन्य व्याधि और उदर रोग नष्ट होते हैं। यह श्वास, खांसी, ज्वर और अरुचि को भी दूर करता है। यह योग इसी नाम से बना बनाया बाज़ार में मिलता है।

पांचों द्रव्यों का परिचय, गुण धर्म और विभिन्न भाषाओं के नाम आपकी जानकारी के bिए यहां प्रस्तुत किये जा रहे हैं-

पीपल
भाषा भेद से नाम भेद-  संस्कृत- पिप्पली। हिन्दी- पीपर, पीपल। मराठी- पिम्पली। गुजराती-पीपर, लींडी पीपर। बंगला-पिपुल। कन्नड़-हिप्पली। तैलुगुपिप्पालु । तामिल-टिप्पली । फारसी- फिलफिलदराज । इंगलिश-लैंग्वेज पीपर (Long pepper).। लैटिन- पाइपर लंगम (Piper Longum).

पीपलामूल :- पीपल की जड़ को ही पीपलामूल (Piper Root) कहते हैं। यह पीपल की तुलना में गर्म, रूखी, पित्तकारक होती है और देखने में कृष्णवर्ण की होती है। शेष गुण पीपल के ही होते हैं।

चव्य:-
भाषा भेद से नाम भेद- संस्कृतचविका। हिन्दी-चव्य। मराठी-चवक । गुजराती-चवक। बंगला-चई। कन्नड़- चव्य। तैलुगु- चेइकम । इंगलिश- जावा लाग पीपर (Jawa Long pepper).। लैटिन- पाइपर चावा (Piper Chava).

चित्रक (चीता) :-

भाषा भेद से नाम भेद- संस्कृतचित्रक। हिन्दी-चित्रक, चीता । मराठीचित्रक, चित्रकमूल । गुजराती-चित्रो। बंगला-चिता। कन्नड़-चित्रमूल। तैलुगुचित्रमूलम । तामिल-चित्तिर । फारसी- शीतर। इंगलिश-लेडवर्ट (Leadwort).। लैटिन- प्म्बेलगो ज़िलेनिका (Plumbago Zeylanica).

 गुण- यह पाक होने पर कटु, अग्निवर्धक, पाचन, हलका, रूखा, गर्म तथा ग्रहणी की शक्ति को बढ़ाने वाला है और संग्रहणी, कोढ़, सूजन, बवासीर, कृमि, खांसी, वात कफ और पित्त को नष्ट करने वाला है।

सोंठ

भाषा भेद से नाम भेद- संस्कृत – शुंठी। हिन्दी-सोंठ । मराठी-सुंठी । गुजराती-सुण्ठ। बंगला-शुण्ठ। कन्नड़– शुंठि। तैलुगु– शोंठी । तामिल-शुक्कु । फारसी– जंजबील खुश्क। इंगलिश ड-|इ जिंजर रूट (Dry Ginger Root).। लैटिन– जिंजिबर आफिशिनेल (Zingiber Officinale).

गुण-शुंठी यानी सोंठ रुचिकारक, आमवातनाशक, पाचक, चरपरी, हलकी, स्निग्ध, उष्ण, पाक होने पर मधुर, कफ वात तथा मलबन्ध को तोड़ने वाली है। वीर्यवद्र्धक, स्वर को उत्तम बनाने वाली, वमन, श्वास, शूल, खांसी, हृदय के रोग, श्पलीद, शोथ, आनाह, उदर रोग और वात के रोगों को नष्ट करने वाली है। यह ग्राही होती है।

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