स्वस्थ और सुखी रखने वाले आयुर्वेद के उपदेश

स्वस्थ और सुखी रखने वाले आयुर्वेद के उपदेश

आयुर्वेद के प्रति रुचि रखने वाले पाठक-पाठिकाओं की जानकारी के लिए, इस लेखमाला के माध्यम से, आयुर्वेद के कुछ ऐसे प्रसंग, सरल शैली में लिख कर प्रस्तुत किये जाते हैं जो हमारे दैनिक जीवन में लाभकारी हों। लेखमाला पढ़ते रहें और लाभ उठाते रहें।

उचित आहार-विहार करना शरीर व स्वास्थ्य के लिए परम हितकारी होने से अत्यावश्यक है और यह आवश्यक जानकारी प्रामाणिक हितकारी तथ्यों के साथ देने वाला दुनिया कला एक मात्र शाशत्र “आयुर्वेद’ ही है। पथ्य-अपथ्य आहार विधि-विधान के बारे में आयुर्वेद के कुछ उपदेश प्रस्तुत कर रहे हैं। इन उपदेशों पर अमल कर स्वस्थ बने रहें। आयुर्वेद एक ऐसा अद्भुत, अद्वितीय और महान शास्त्र है जो हमारे जीवन के लिए उपयोगी जैसे रहस्यों का उद्घाटन करता है वैसे अन्य किसी स्वास्थ्य एवं चिकित्सा से सम्बन्धित शास्त्र में पढ़ने को नहीं मिलते। अब देखिए चरक संहिता में एक जगह कहा है- “अनेनोपदेशेन नानौषधि भूतं जगति किंचिद् द्रव्यमुपलभ्यते तां तां युक्तिमर्थं च तं तमभिप्रेत्य।’ (चरक संहिता सूत्र.) अर्थात् संसार में ऐसा कोई भी द्रव्य नहीं जो भिन्न भिन्न युक्ति और उचित मात्रा के अनुसार सेवन करने पर औषधि का काम न देता हो। विष से भी आयुर्वेद औषधि का काम लेना जानता है यथा- “विषं प्राणहरं तच्च युक्तियुतं रसायनम्’ (चरक संहिता चिकित्सा.) अर्थात् विष प्राणों के लिए घातक होता है फिर भी उचित युक्ति व मात्रा से सेवन करने पर रसायन (औषधि) का काम करता है। काश ! जब हमारा देश स्वतन्त्र हुआ था तभी भारत सरकार ने स्कूल व कालेजों में  आयुर्वेद को अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाना शुरू करवा दिया होता तो आज देशवासियों का स्वास्थ्य, चरित्र और आचरण कुछ और ही होता और हमारे लिए इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि 26 वर्ष पहले हम निरोगधाम पत्रिका का प्रकाशन शुरू नहीं करना पड़ता क्योंकि फिर स्वास्थ्य शिक्षा देने वाली पत्रिका की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। हम भी 72 वर्ष की आयु में दिन रात, उठते बैठते सोते जागते, निरोगधाम के लेखनसम्पादन करने में व्यस्त न रह कर भगवान
भजन करते, नाती पोते खिलाते या हम दोनों (पति-पत्नी) दर्शनीय स्थानों की सैर किया करते जबकि अभी तो स्थिति यह है कि गत फरवरी 2003 में 28 वर्ष बाद दिल्ली गये थे, उसके बाद फिर दो वर्ष बीत गये पर दो बार निमन्त्रण मिलने पर भी जाना नहीं हो सका। इतनी कथा सुनाने का तात्पर्य यह है कि स्कूल कालेजों में स्वास्थ्य शिक्षा का जो अभाव है उसे दूर करना और अपने प्रिय पाठक-पाठिकाओं को आयुर्वेद का हर सम्भव तथा उपयोगी ज्ञान व स्वास्थ्य शिक्षा देना ही निरोगधाम को प्रकाशित करने का उद्देश्य है और हमारे शेष जीवन का सदुपयोग
भी। अब पथ्य-अपथ्य आहार के बारे में आयुर्वेद के महत्वपूर्ण, उपयोगी और हितकारी कुछ निर्देश प्रस्तुत करते हैं। कृपया ध्यान से पढ़ें और इनसे लाभ उठा कर हमारा परिश्रम और आपका निरोगधाम पढ़ना सार्थक करें।

 

आयुर्वेद का कहना है कि उचित आहार-विहार का विधि-विधान के अनुसार पालन करना स्वस्थ और अस्वस्थ के लिए तो ज़रूरी और हितकारी तो होता है पर कुछ रोगी ऐसे भी होते हैं जिनके लिए यह विधि-विधान उपयोगी नहीं होता बल्कि उनके रोग के अनुसार अनुकूल सिद्ध होने वाला आहार लेना उपयोगी होता है। यह ऐसा रहस्य है जिसे हर कोई नहीं जानता। यहां हम आम आदमी के लिए उचित और हितकारी आहार ग्रहण करने के लिए, आयुर्वेद द्वारा दिये गये दस उपदेशों की जानकारी प्रस्तुत कर रहे हैं। चरक संहिता के विमान स्थान का एक श्कलो प्रस्तुत है-

“उष्णं, स्निग्धं, मात्रावत्, जीर्णे, वीर्याविरुद्धम, एश्टते देशे, इष्ट सर्वोपकरणं, नातिद्रुतं, नातिविbम्बितम्, अजल्पन, अहसन्, तन्मना भुएजीत, आत्मानमभि समीक्ष्य सम्यक्’

अर्थात् गर्म, स्निग्ध, मात्रापूर्वक, पहले किया हुआ भोजन पच जाने पर, वीर्य के अविरुद्ध, अपने मन के अनुकूल स्थान पर, अनुकूल सामग्री से युक्त आहार को, न अधिक जल्दी, न अधिक देर से, न बातचीत करते हुए, न हंसते हुए, एकाग्रचित्त हो कर और अपनी पाचन शक्ति के अनुकूल मात्रा मेंं ग्रहण करना चाहिए।

यह तो हुआ श्कलो का शब्दशः अर्थ अब आम आदमी की जानकारी के लिए इन दस बातों को, संक्षिप्त रूप में, सरल व सुगम शैली में लिख कर प्रस्तुत कर रहे हैं।

(1)उष्ण आहार से लाभ– भोजन गर्म हो तो ही स्वादिष्ट लगता है, गर्म भोजन से जठरा¾ि तेज़ होती है, भोजन शीघ्र पच जाता है, कफ का शोषण होता है और वायु का अनुलोम होता है अतः गर्म भोजन करना चाहिए।

(2) स्निग्ध आहार से लाभ- स्निग्ध भोजन खाने में अच्छा लगता है, उदर में पहुंच कर अग्नि प्रदीप करता है पचता भी जल्दी है, शरीर का पोषण और उपचय (वृद्धि) करता है, इन्द्रियों को दृढ़ कर उन्हें बलवान बनाता है, शारीरिक बल बढ़ाता है और त्वचा का रूप रंग साफ करता है।

(3) मात्रा पूर्वक आहार से लाभ- उचित मात्रा में यानी अपनी पाचन शक्ति के अनुकूल मात्रा में किया हुआ भोजन वात पित्त कफ को कुपित न करते हुए पूर्णतः स्वास्थ्यवद्र्धक होता है, अग्नि को नï नहीं करता, बिना किसी अड़चन के पच जाता है और आसानी से गुदा तक पहुंच कर मल के रूप में विसर्जित हो जाता है।

(4) पचने पर आहार से लाभ- यदि पहले का खाया हुआ जीर्ण न हुआ हो यानी पचा न हो तो इस अवस्था को “अजीर्ण’ कहते हैं। अजीर्ण-अवस्था में भोजन करने से, उदर में पहले का पड़ा हुआ अपचा रस नये भोजन में मिल कर दोषों को कुपित कर देता है। पहले का भोजन पच जाने पर अग्री प्रदीप्त रहने पर, भूख लगने पर और पेट हलका होने पर ही भोजन करना चाहिए।

(5) अविरुद्ध वीर्य वाले आहार से लाभ- जो पदार्थ परस्पर वीर्य विरुद्ध न हों, उन्हें ही एक साथ खाना चाहिए। इससे विकार और रोग उत्पन्न नहीं होते। परस्पर विरुद्ध वीर्य (गुण व शक्ति) वाले पदार्थ एक साथ खाने से विकार और रोग उत्पन्न होते हैं।

(6) अनुकूल स्थान में आहार से लाभ- मन के अनुकूल स्थान पर मन के अनुकूल सामग्रियों वाला भोजन करने से मन में अप्रिय विचार नहीं आते, मन प्रसन्न रहता है अतः मन के अनुकूल स्थान में ही मन को प्रिय पदार्था का सेवन करना चाहिए।

(7) जल्दी जल्दी आहार लेने में हानि- जल्दी जल्दी भोजन करने से उसमें लालारस ठीक से मिल नहीं पाता जिससे पाचन में विलम्ब होता है और आहार द्रव्यों का पूरा लाभ शरीर को नहीं मिल पाता इसलिए ठीक से खूब चबा-चबा कर धीरे-धीरे भोजन करना चाहिए।

(8) बहुत धीरे-धीरे आहार लेने से हानि- बहुत धीरे-धीरे, रुक-रुक कर भोजन करने से तृप्ति नहीं होती और ज्यादा मात्रा में खा लिया जाता है, आहार ठण्डा भी हो जाता है और इसका पाक विषम हो जाता है इसलिए बहुत धीरे-धीरे और रुक-रुक कर भोजन नहीं करना चाहिए।

(9) एकाग्रचित्त हो आहार लेने से लाभ- किसी चिन्ता वाले विषय पर विचार करते हुए या बातचीत करते हुए और हंसते खिलखिलाते हुए भोजन नहीं करना चाहिए बल्कि एकाग्रचित्त हो कर भोजन में मन लगा कर ही भोजन करना चाहिए इससे भोजन भली भांति पचता भी है और अंग भी लगता है।

(10) आत्मशक्ति के अनुसार आहार लेने से लाभ- यह आहार मेरे लिए लाभकारी है या हानिकारक है ऐसा 22 निरोगधाम अप्रैल 05 ग्रीष्म ऋतु अंक विचार कर जो आहार अपने लिए सात्म्य हो वैसा ही आहार अपनी शक्ति के अनुकूल मात्रा में लेना स्वास्थ्य एवं शरीर के लिए हितकारी होता है।

भोजन के विषय में मोटे रूप से बताई गई इन दस बातों का ध्यान रख कर आहार लेने से रोगों से बचाव होता है, शरीर पुष्ट और सबल बना रहता है और बुढ़ापा दूर रहता है। यदि हम पूरी लगन से मन लगा कर इन दस बातों का पालन करने की कोशिश करें तो पालन कर सकते हैं क्योंकि इसमें कोई पैसा खर्च करना नहीं है सिर्फ मन को वश में रख कर, विवेक और संयम से काम लेना है। हम इन बातों का पालन करने में जितने सफल होंगे उतना ही लाभ होगा और जितने असफल होंगे उतनी ही हानि होगी। अब यह फैसला हम करें कि स्वास्थ्य रक्षा के लिए हमें क्या करना चाहिए

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