अर्जुनारिष्ट

अर्जुनारिष्ट

अर्जुनारिष्ट का उल्लेख सुप्रसिद्ध आयुर्वेदिक ग्रन्थ भैषज्य रत्नावली के ” हरिदय रोग चिकित्सा प्रकरण’ में पार्थारिष्ट के नाम से मिलता है। इस ग्रन्थ के अनुसार इसको सेवन करने से हिरदय और फेफड़ों मे उत्पन्न हुए समस्त विकार नष्ट होते हैं और बलवीर्य की वृद्धि होती है। “पार्थ’ अर्जुन का ही पर्यायवाची शब्द है। अद्भुत वनस्पति “अर्जुन’ से बनने वाला यह योग “अर्जुनारिष्ट से आपका परिचय कराते हैं ।

घटक द्रव्य  अर्जुन की छाल 4 किलो, द्राक्षा (दाख या मुनक्का) 2 किलो, महुए के फूल 800 ग्राम, गुड़ 4 किलो, धाय के फूल 800 ग्राम और पानी 40 लिटर। इन द्रव्योंकी मात्रा, इसी अनुपात में कम या ज्यादा की जा सकती है।

निर्माण विधि – अर्जुन की छाल, मुनक्का और महुआ के फूल-इनतीनों को मोटा मोटा जौ कुट कर40 लिटर पानी में डालकर उबाले। जब जल का एक चौथाई अंश यानी 10 लिटर शेष बचे तब उतारकर छान ले । ठण्डा कर के गुड़ और धाय के फूल डल कर मिट्टी के बर्तन मेंभर दें व
ढक्कन लगाकर एक माह तक रखा रहने दें। एक माह बाद इसे छानकर शीशियों में भर ले ।

मात्रा और सेवन विधि- इसे दोनों वक्त, सुबह-शाम भोजन के बाद, 2-2 चम्मच मात्रा में, आधा कप पानी में मिलाकर पिएं । लाभ – लगातार कुछ दिनों तक पीने से पित्त प्रकोप, हरिदयरोग, हरिदय की निर्बलता, फेफड़ों की सूजन, हरिदय का दर्द, धड़कन की शिथिलता आदि व्याधियां नष्ट होती है। धड़कन की बीमारी ठीक होती है और दिल मजबूत होता है ।

 

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